Atal Bihari Vajpayee Jayanti
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती आज पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जा रही है। अटल जी न केवल एक कुशल प्रशासक थे, बल्कि वे राजनीति में शालीनता, संवाद और वैचारिक दृढ़ता के प्रतीक भी रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति का एक चर्चित किस्सा उनकी लोकतांत्रिक सोच को उजागर करता है। वर्ष 1996 में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए उन्होंने कहा था—
“सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए।”
सिर्फ 13 दिन की सरकार होने के बावजूद अटल जी ने सत्ता से अधिक लोकतंत्र और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी। विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने सदैव मर्यादा और संवाद की राजनीति की मिसाल पेश की।
प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में भारत ने पोखरण परमाणु परीक्षण कर वैश्विक मंच पर अपनी ताकत का परिचय दिया। स्वर्णिम चतुर्भुज, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और दूरसंचार क्षेत्र में सुधार जैसे फैसलों ने देश के विकास को नई गति दी।
कवि हृदय वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में अपनी ओजस्वी वाणी से लोकतंत्र को नई ऊँचाई दी। विरोधियों की आलोचना करते हुए भी उन्होंने कभी व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं किए। उनकी जयंती पर देश उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद कर रहा है, जिन्होंने सत्ता को सेवा और राजनीति को संस्कार का माध्यम बनाया।
अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक शुचिता का एक और ऐतिहासिक उदाहरण वर्ष 1977 का है, जब वे विदेश मंत्री थे। संयुक्त राष्ट्र महासभा में उन्होंने हिंदी भाषा में भाषण देकर पूरी दुनिया का ध्यान भारत की सांस्कृतिक पहचान की ओर खींचा। उस समय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अंग्रेज़ी का वर्चस्व था, लेकिन अटल जी ने हिंदी में भारत की बात रखकर यह संदेश दिया कि भारत अपनी भाषा और विचारों के साथ विश्व मंच पर खड़ा है। यह क्षण भारतीय राजनीति और कूटनीति के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है।
एक और प्रसंग उनकी उदार राजनीति को दर्शाता है। जब 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की संसद में खुलकर प्रशंसा की, तब वे विपक्ष में थे। अटल जी ने कहा था कि “पंडित नेहरू की नीयत और राष्ट्रभक्ति पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।” विरोध के बावजूद राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देना उनकी राजनीति का मूल स्वभाव था।
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