मेरठ में 14 साल में 100 से ज्यादा वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी विकास चौबे फरार रहना और सरकारी गनर के साथ घूमता रहना कानून व्यवस्था पर बड़ा अक्सर छोड़ रहा है।
14 साल में 100 से ज्यादा वारंट… गैर-जमानती वारंट तक जारी… लेकिन आरोपी अब भी फरार!
UP NEWS UPDATE :मेरठ: 14 साल में 100+ वारंट, फिर भी फरार आरोपी – कानून व्यवस्था पर बड़े सवाल
मेरठ से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न्याय, कानून लागू करने वाली मशीनरी और स्थानीय प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक व्यक्ति पर लगभग 14 वर्षों में 100 से ज्यादा वारंट जारी हुए, जिनमें गैर‑जमानती वारंट भी शामिल हैं, लेकिन वह आज तक गिरफ्त में नहीं आ सका है। इस पूरे घटनाक्रम ने “क्या यह आरोपी कानून और कोर्ट से भी ऊपर है?” जैसे सवाल हवा‑हवाई कर दिए हैं।
14 साल में 100+ वारंट, लेकिन आरोपी फरार
सूत्रों के अनुसार आरोपी विकास चौबे के खिलाफ अलग‑अलग मामलों में लगभग 14 वर्षों में 100 से अधिक वारंट जारी हो चुके हैं, जिनमें कुछ गैर‑जमानती भी हैं। यह कहा जाता है कि फिर भी न तो उसे गिरफ्तार किया जा सका, न ही उसकी गिरफ्तारी पर असली ठोस कार्रवाई दिखाई दी है। इस दौरान वह न केवल खुलेआम मेरठ में घूमता रहा, बल्कि सरकारी ठेके लेने और उनसे लाभ उठाने जैसे आरोप भी लगे हैं।
चरित्र प्रमाण पत्र तक बनवाया, सरकारी गनर के साथ घूमा
यह मामला दिलचस्प होता जा रहा है कि जिस व्यक्ति पर दसियों आपराधिक और खास धाराओं में मामले दर्ज हैं, उसने चरित्र प्रमाण पत्र तक बनवा लिया और इससे आधिकारिक दस्तावेज़ीकरण के झुंड में घूसने की कोशिश की। और तो और, कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार यह व्यक्ति सरकारी गनर के साथ भी दिखाई दिया, जिसकी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर सामने आईं, जिन्हें लोगों ने “सुरक्षा‑कवच” की तरह देखा, जिससे आम जनता में रोष और असुरक्षा की भावना दोनों बढ़ी है।
पीड़ित पक्ष का सवाल – लापरवाही या बड़ी सेटिंग?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब अदालत बार‑बार वारंट जारी कर रही है, तो आखिर स्थानीय पुलिस गिरफ्तारी क्यों नहीं कर पा रही? आरोप यह भी लग रहे हैं कि शायद यह सिर्फ लापरवाही न होकर किसी राजनीतिक या निर्माण‑संबंधित “बड़ी सेटिंग” का हिस्सा हो सकता है, जिससे आरोपी को खुली छूट मिल रही है। पीड़ित पक्ष का कहना है कि यदि ऐसी ही स्थिति बनी रही, तो उन्हें अंततः सुप्रीम कोर्ट या अन्य उच्च न्यायालय जाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है ताकि उन्हें न्याय मिल सके।
कानून व्यवस्था पर सवाल – आगे क्या होगा
यह मामला अब सिर्फ एक व्यक्तिगत गिरफ्तारी की बात नहीं रह गया है, बल्कि यह जिले की कानून व्यवस्था और न्याय‑प्रणाली की कार्यक्षमता पर भी सीधा सवाल उठा रहा है। अब देखना यह होगा कि मेरठ पुलिस क्या इस मामले में वास्तविक स्तर पर सख्त कार्रवाई करती है – जैसे गिरफ्तारी, पुराने वारंटों की जमीनी स्तर पर जांच और उचित विभागीय जवाबदेही – या फिर यह मामला भी फाइलों और दस्तावेजों में दबकर रह जाएगा। यदि ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इससे कानून की छवि और जन‑विश्वास दोनों पर भारी नुकसान पहुंच सकता है।
निष्कर्ष
मेरठ के इस मामले ने साफ कर दिया है कि जब अदालत लगातार वारंट जारी कर रही है और पुलिस गिरफ्तारियों से चूक रही है, तो कानून की छवि और जन‑विश्वास दोनों पर सीधा खतरा मंडराने लगता है। आरोपी विकास चौबे पर 14 साल में 100 से ज्यादा वारंट होने के बावजूद घूमता रहना, चरित्र प्रमाण पत्र बनवाना और सरकारी गनर के साथ दिखाई देना – यह सिर्फ एक व्यक्तिगत चूक नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली और पुलिस व्यवस्था की कुछ गंभीर कमियों की ओर इशारा करता है। अगर स्थानीय प्रशासन और पुलिस इस मामले में ठोस, पारदर्शी और त्वरित कार्रवाई नहीं करते, तो पीड़ित पक्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना अंतिम विकल्प बन सकता है, जो स्वयं कानून व्यवस्था की तस्वीर को और खराब दिखाएगा।
