फर्रुखाबाद के ARTO कार्यालय में जमीन पर बैठाए जा रहे आम जनता और कुर्सी पर बैठे अधिकारियों के दृश्य ने तानाशाही शैली पर जन आक्रोश को भड़का दिया है।
ARTO प्रशासन कृष्ण कुमार यादव तानाशाही गाड़ी मालिकों को कदमों में बैठकर करते सुनवाई
UP NEWS UPDATE :फर्रुखाबाद जनपद के एआरटीओ (ARTO) कार्यालय में आम जनता के साथ हो रहे व्यवहार और कार्यप्रणाली के कारण विवाद और बवाल खड़ा हो गया है। आरोप है कि एआरटीओ कृष्ण कुमार यादव अपने कार्यालय में तानाशाही अंदाज में काम चला रहे हैं, जहां फरियादी और गाड़ी मालिकों को जमीन पर बैठाकर सुनवाई की जा रही है, जबकि खुद कुर्सी पर बैठकर आदेश देने का दृश्य दिखाई दे रहा है। इससे जनता में भारी रोष है और सोशल मीडिया पर भी इस बर्ताव को लेकर चर्चा छिड़ गई है।
फर्रुखाबाद ARTO कार्यालय में क्या चल रहा है
फर्रुखाबाद के ARTO कार्यालय में जो दृश्य देखने को मिल रहे हैं, वे आम नागरिकों के लिए आत्म‑सम्मान की तरह नहीं, बल्कि अपमानजनक बताए जा रहे हैं। कई शिकायतों के अनुसार वाहन मालिकों और आवेदकों को कार्यालय के बाहर या भीतर जमीन पर बैठाकर रखा जाता है, जबकि एआरटीओ और अन्य अधिकारी कुर्सी पर विराजमान रहते हैं। इसे कई लोग अंग्रेजी राज के जमाने की तानाशाही की तरह बता रहे हैं, जब आम जनता को “चरणों में बैठकर” याचना करने को मजबूर किया जाता था।
ड्राइविंग लाइसेंस और फिटनेस की लंबी लाइनें
ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने आने वाले लोगों को लंबी‑लंबी लाइनों में घंटों उभरा रहना पड़ता है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति अपनी शिकायत या देरी के बारे में सुनवाई के लिए अंदर बुलाया जाता है, तो उसके साथ भी जमीन पर ही बैठकर सुनवाई की जाती है। यह न केवल आरामहीन है, बल्कि इससे व्यक्ति को सामने वाले पक्ष के आचरण के प्रति अपमान का अहसास होता है।
गाड़ी की फिटनेस कराने आए कई वाहन मालिकों ने भी शिकायत की है कि एआरटीओ कार्यालय में उन्हें जमीन पर बैठाकर रखा जाता है, जबकि खुद एआरटीओ और संबंधित अधिकारी कुर्सी पर बैठकर “हुकूमत चलाते” दिखाई देते हैं। यह दृश्य कई बार सोशल मीडिया पर भी वायरल हो चुका है, जिसमें एक तरफ फरियादी जमीन पर बैठा है और दूसरी तरफ अधिकारी कुर्सी पर, जिसे लोग “मानवता को शर्मसार करने वाली तस्वीर” जैसा कह रहे हैं।
दलालों के दम पर चल रहा ARTO का खेल?
आरोप यह भी है कि ARTO कार्यालय में दलाल‑प्रणाली बहुत मजबूत हो गई है। लोगों का कहना है कि जो आम आदमी सीधे जाता है, उसे लंबा इंतजार और अनदेखी का सामना करना पड़ता है, जबकि दलालों के माध्यम से जाने वालों को आसानी से तेजी से काम निपटा दिया जाता है। इससे यह धारणा बनती है कि ARTO का पूरा खेल दलालों के दम पर चल रहा है, जिससे आम जनता को न केवल समय और पैसे का नुकसान होता है, बल्कि उनकी आत्म‑सम्मान की भावना भी ठेस पहुंचती है।
जनता की शिकायतें और आरोप
कई अभिभावियों और गाड़ी मालिकों का कहना है कि आरोपी एआरटीओ कृष्ण कुमार यादव के व्यवहार से ऐसा लगता है कि जमीन पर बैठे लोगों के साथ कोई बराबर का नागरिक नहीं, बल्कि कोई “निम्न दर्जा” वाला व्यक्ति लगता है। इसे लोग सरकारी अधिकारियों की संवेदनहीनता और तानाशाही की परंपरा का जीवित नमूना बता रहे हैं। आरोप यह भी है कि यदि किसी ने सीधे काम नहीं बनाया तो अपमानजनक भाषा और खिंचाई‑तानाशाही का सामना करना पड़ता है, जिससे आम जनता को इज्जत नहीं, बल्कि जमीन पर “नसीब हो रही है।”
अब तक क्या हुआ, आगे क्या हो सकता है
अभी तक इस मामले में आधिकारिक जांच या अधिकारियों की ओर से कोई जन‑सामान्य के लिए स्पष्ट तरह का आश्वासन नहीं सामने आया है, जिससे लोग असुरक्षित और निराश हैं। स्थानीय लोग और अन्य अधिकारी जोन वाले इस घटनाक्रम को लेकर दोबारा जांच और कड़ी निगरानी की मांग कर रहे हैं। यदि प्रशासन इस बारे में जल्द से जल्द स्पष्ट रुख अपनाता है, तो न केवल फर्रुखाबाद बल्कि पड़ोसी जनपदों के नागरिकों के लिए भी ARTO कार्यालय कार्यप्रणाली में बदलाव की उम्मीद बन सकती है।
निष्कर्ष
फर्रुखाबाद के ARTO कार्यालय में जमीन पर बैठाए जा रहे आम जनता और कुर्सी पर विराजमान अधिकारियों का दृश्य सिर्फ एक व्यक्तिगत व्यवहार नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवा में संवेदनहीनता और तानाशाही की प्रथा का प्रतीक बन गया है। इस मामले ने यह भी साफ कर दिया है कि जब तक अधिकारियों के रवैये में मानवता और सम्मानपूर्ण व्यवहार की जगह नहीं बनेगी, तब तक सरकारी सेवाएं चाहे जितनी नीति‑आधारित हों, आम जनता के लिए उन्हें प्रतीक्षा और अपमान की यात्रा बनाती रहेंगी। यदि प्रशासन इस मुद्दे पर जांच, निगरानी और संवेदनशील प्रशिक्षण के माध्यम से सुधार लाता है, तो ARTO जैसे कार्यालय भी जन‑सम्मान की जगह जन‑अपमान के लिए नहीं, बल्कि जन‑सहयोग के लिए याद किए जा सकते हैं।
