कन्नौज के किसान ने आलू के भाव गिरने से निराश होकर खड़ी फसल खेत में ही जुतवा दी।
आलू हुआ सस्ता तो किसान ने खड़ी फसल जुतवाई,किसान ने 7 बीघा आलू की खड़ी फसल खेत मे जुतवाई,मंडी में 100 से 150 रुपये बिक रहा
UP NEWS UPDATE :कन्नौज – आलू के भाव इतने गिर गए हैं कि किसान अप
नी ही लहलहाती फसल को खेत में ही ट्रैक्टर से जुतवाने को मजबूर हो रहे हैं। कन्नौज छावनी तहसील के छिबरामऊ क्षेत्र के चन्द्रपुर निवासी किसान गोकुल ठाकुर ने 7 बीघा में लगी आलू की खड़ी फसल को खेत में ही जोतवा दिया, क्योंकि मंडी में आलू का भाव एक पैकेट पर केवल 100–150 रुपये ही मिल रहा है जबकि उसे खेत से खोदकर लाने, पैकिंग और मंडी पहुँचाने में अकेले 100 रुपये की लागत आ रही है।
आलू सस्ते, लागत नहीं निकली
किसान गोकुल ठाकुर ने बताया कि इस बार आलू की खेती में बीज, खाद, सिंचाई, बिजली, डीजल और मजदूरी पर भारी राशि लगी, लेकिन जब मंडी में भाव देखे तो लगता है मानो उनकी सारी मेहनत बेकार जा रही हो। छिबरामऊ मंडी में आलू की औसत कीमत लगभग 100–150 रुपये प्रति पैकेट (लगभग 50–55 किलो) के आसपास है, जबकि एक पैकेट उठाकर लाने तक का खर्च अकेले 100 रुपये आ जाता है। ऐसे में फसल खोदकर मंडी में बेचना किसान के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
खेत में ही जुतवाई खड़ी फसल
गोकुल ठाकुर ने बताया कि दो दिन से उनकी खेती में आलू की हरियाली फैली हुई थी, लेकिन अब उसी खेत में ट्रैक्टर चलाकर लहलहाती फसल को जोत दिया गया। 7 बीघा में लगी यह पूरी फसल अब मिट्टी में मिल चुकी है। किसान का कहना है कि ऐसा कदम उठाना बेहद दर्द भरा है, लेकिन नुकसान और बढ़ने से बचने के लिए बेचारगी में यही रास्ता बचा। इधर, कन्नौज के कई अन्य किसानों ने भी आलू की खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाकर जुताई कर दी है, क्योंकि भाव बहुत कम होने से लागत भी निकलना मुश्किल हो गया है।
“आय दोगुनी” की बातें और किसान का कड़वाहट
गोकुल ठाकुर ने सरकारी वायदों पर भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, “सरकार ने किसानों से आय दोगुनी का वादा किया था, लेकिन आलू काटकर देखो तो एक के बजाय चार आलू निकल रहे हैं, यानी नुकसान ही दोगुना हो रहा है।” किसान का आरोप है कि बीज, खाद, डीजल, पेट्रोल और एलपीजी गैस के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन उपज का भाव उतने ही गिर रहा है, जिससे छोटे–मध्यम किसान दिन‑ब‑दिन और दबते जा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय संकट का घरेलू असर
किसानों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे संघर्ष और तेल–गैस की कीमतों में उछाल का असर सीधे गाँवों में दिख रहा है। न केवल उर्वरक और डीजल की कीमतें बढ़ी हैं, बल्कि बाजार में आलू की आपूर्ति अधिक होने के कारण भाव धपेटू बन कर गिर रहे हैं। इससे किसान हताशी और चिंता के बीच फंसे हुए हैं, जिसकी वजह से अब उन्हें निराश होकर अपनी फसल को ही खेत में दबाना पड़ रहा है।
किसानों की मांगें
क्षेत्र के किसान मंडी में आलू के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करने और सरकारी खरीद की व्यवस्था शुरू करने की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में उनकी मेहनत का लाभ मिल सके। गोकुल ठाकुर ने कहा कि यदि सरकार ने अभी भी किसानों की आवाज़ सुनने की बजाय उन्हें नजरअंदाज करना जारी रखा, तो दिनों‑दिन खेती करना आम किसान के लिए और भी असम्भव होता जाएगा।
निष्कर्ष
आलू के भाव गिरने से किसान को अपनी लहलहाती फसल खेत में ही जुतवानी पड़ रही है, यह बात आज के ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोरी और कृषि नीतियों में दिखने वाली खामी को दर्शाती है। किसान की मेहनत और लागत के बावजूद उसे न्यूनतम लाभ न मिल पाना कृषि को घाटे का सौदा बना रहा है, जिससे भविष्य में फसल पैटर्न और खेती की आकर्षकता दोनों पर असर पड़ सकता है। इस घटना से यह साफ होता है कि किसानों को समर्थन मूल्य, उचित भण्डारण और समय पर बाजार की व्यवस्था जैसी ठोस व्यवस्थाएँ देना अब जरूरी हो चला है, ताकि आलू जैसी दैनिक वस्तु की खेती किसान के लिए भी सम्मानजनक और लाभदायक बन सके।
